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देश में बढ़ रही निर्भया की संख्या, कुछ लोगों को शर्म नहीं आती

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देश में rape की घटनाएं बढती ही जा रही हैं। हाल ही में हुए rape के मामलों ने सबको हीला कर रख दिया है।

निर्भया से पहले और इस मामले के बाद निर्भया की गिनती कभी कम नहीं हुई बल्कि लगातार बढ़ी ही है। लगातार इस तरह के मामले सामने आ रहे हैं। बीते तीन वर्षों में बच्‍चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों में करीब 34 फीसद की तेजी दर्ज की गई है।

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अपने को एक सभ्‍य समाज का हिस्‍सा कहलाने वालों के लिए यह और भी शर्म की बात है कि अधिकतर मामलों में पीडि़ता का करीबी और रिश्‍तेदार ही इस तरह की हैवानियत को अंजाम देने वालों में शामिल रहा है।

यह हालत सिर्फ भारत की ही नहीं है बल्कि पाकिस्‍तान में भी ऐसा ही हाल है। जनवरी में वहां पर सात साल की मासूम जैनब अंसारी की rape के बाद हत्‍या कर दी गई थी। जिसके बाद वहां पर कई जगहों पर इंसाफ की मांग को लेकर प्रदर्शन किए गए थे। अब मंगलवार को एक बार फिर कराची की सड़कों पर यही सब दोबारा देखने को मिल रहा है।

उन्‍नाव और कठुआ में हुए rape मामलों ने एक बार फिर से हमारा सिर शर्म से झुका दिया है। कठुआ मामले की गूंज संयुक्‍त राष्‍ट्र तक में सुनाई दी है। संयुक्‍त राष्‍ट्र के महासचिव एंटोनिया गुतेरेस ने इस मामले में दोषियों की जल्‍द गिरफ्तारी और उन्‍हें सख्‍त सजा देने की अपील की है। लेकिन उन्‍नाव और कठुआ के बाद भी यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है।

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इस बार सात वर्षीय राबिया से rape के बाद हत्‍या किए जाने के बाद व बहरहाल, इतना सब होने पर भी एक हम हैं जिन्‍हें शर्म नहीं आती है। कठुआ में मासूम के साथ हुए rape और हत्‍या के बाद भारत में भी जनता के बीच आक्रोश साफ दिखाई देता है।

लड़कियां, महिलाएं और दूसरे लोग एक बार फिर सड़क पर इंसाफ की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं तो कुछ उसके लिए कैंडल मार्च कर रहे हैं। राजनीतिक पार्टियां भी इसमें पीछे नहीं हैं।

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मामला अपने अंजाम तक पहुंचने के बाद भी फिलहाल ठंडा ही पड़ा है। ऐसा इसलिए क्‍योंकि निचली अदालत और हाईकोर्ट ने इस मामले के सभी दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है, लेकिन अभी इस मामला सुप्रीम कोर्ट में है।

पिछले दिनों कांग्रेस ने भी इसी तरह का एक कैंडल मार्च किया था। लेकिन अफसोस ये है कि कांग्रेस ने ही 16 दिसंबर 2012 को निर्भया के लिए इंसाफ मांगने वालों पर लाठी भांजी थी और आंसू गैस के गोले छोड़े थे। इस वाकये को भी अब छह वर्ष बीत गए हैं।

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बीते तीन वर्षों में इस तरह के अपराध तो बढ़े हैं लेकिन न तो कोर्ट की गिनती बदली न ही जजों की संख्‍या में कोई इजाफा हुआ है। देश के कोर्ट यहां तक की सुप्रीम कोर्ट भी जजों की कमी से जूझ रहा है।

ऐसा हम नहीं बल्कि दिल्‍ली पुलिस की एक रिपोर्ट इसको बयां कर रही है। इसके अलावा नोबल पुरस्‍कार पाने वाले कैलाश सतयार्थी की भी रिपोर्ट ऐसा ही कुछ बताती है।

शहरों में मौजूद अनाधिकृत कालोनियों में इस तरह के अपराध ज्यादा हुए हैं। यह अफसोस की बात ही कही जाएगी कि जिन जगहों को सबसे ज्यादा महफूज माना जाता है वहीं पर हमारी बच्चियां सबसे ज्‍यादा शिकार बनाई जा रही हैं।

कैलाश सत्यार्थी की रिपोर्ट एक और चौंकाने वाला खुलासा करती है। इस रिपोर्ट के मु‍ताबिक पांच से नौ वर्ष की पांच बच्चियों में से एक बच्‍ची यौन शोषण का शिकार बनती है। इस रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि इस तरह के अपराध गांवों के मुकाबले शहरों में ज्‍यादा हो रहे हैं।

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